गलत लोगों से प्यार होना एक आम लेकिन दर्दनाक अनुभव है, जिससे लगभग हर इंसान अपने जीवन में कभी न कभी गुजरता है। यह हर बार एक जैसे शुरू होता है—एक मुस्कान, थोड़ी केयरिंग, और वो अहसास कि “यही है मेरा हमसफ़र।” लेकिन कुछ समय बाद, वही रिश्ता दर्द, उलझन और खुद से दूरी का कारण बन जाता है। हम सोचते हैं कि अगली बार समझदारी से काम लेंगे, लेकिन दिल… फिर वही गलती दोहरा देता है।
तो आखिर क्यों होता है बार-बार गलत लोगों से प्यार?
क्या हमारी मोहब्बत में कुछ कमी है, या हमारी समझ में?
हम सबने कभी न कभी महसूस किया है—वो चिंगारी, वो मुस्कान, वो अहसास जिसे हम ‘किस्मत’ समझ बैठते हैं। लगता है जैसे वो इंसान हमारे लिए बना हो। लेकिन फिर अचानक, सब कुछ बिखर जाता है। जो कभी ‘घर’ सा लगता था, वही इंसान हमें अंदर से तोड़ने लगता है। हम फिर वादा करते हैं कि अगली बार समझदारी से काम लेंगे, ‘रेड फ्लैग्स’ को पहचानेंगे, लेकिन दिल… दिल तो अपनी ही धुन पर चलता है।
ऐसे में सवाल उठता है—क्या हमारी मोहब्बत में कोई खोट है? या फिर हमें प्यार की परिभाषा ही दोबारा समझनी चाहिए?
शायद जवाब हमारे ही भीतर, हमारे शास्त्रों में छिपा है। भगवद गीता, जो एक युद्धभूमि पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के बीच संवाद है, हमें प्रेम और आत्मबोध के रिश्ते की गहरी समझ देती है। गीता बताती है कि प्रेम भी युद्ध की तरह है—साफ दृष्टि, विवेक और आत्मज्ञान की मांग करता है। अक्सर जो हमें तोड़ते हैं, वो लोग नहीं… बल्कि हमारी गलत धारणाएं होती हैं जिनसे हम चिपके रहते हैं।
भगवद गीता इस सवाल का जवाब बेहद सटीक और आध्यात्मिक तरीके से देती है…
1. इंद्रिय सुख की लालसा कैसे भ्रम पैदा करती है

श्लोक – भगवद गीता 2.62
“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥”
जब हम किसी व्यक्ति के सौंदर्य, व्यवहार या आकर्षण पर बार-बार ध्यान देते हैं, तो उसके प्रति हमारा मोह बढ़ता है। यह मोह फिर इच्छा बनता है, और जब वह इच्छा पूरी नहीं होती तो हम क्रोधित होते हैं, दुखी होते हैं।
गीता कहती है कि यह सब मोह का परिणाम है—एक प्रकार का भ्रम। हम उस व्यक्ति को नहीं, बल्कि अपने ही मानसिक प्रोजेक्शन को प्यार करते हैं। इसलिए हम गलत लोगों की तरफ खिंचते हैं, क्योंकि हम उनके असली स्वरूप को नहीं, अपने मन के आइने में बनी उनकी तस्वीर को देख रहे होते हैं।
2. अधूरी आत्मा में पूर्णता की तलाश

श्लोक – भगवद गीता 2.70
“आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥”
हम जब अपने जीवनसाथी में संपूर्णता ढूंढते हैं—खुशी, सुरक्षा, आत्म-मूल्य—तो हम भावनात्मक रूप से निर्भर हो जाते हैं। यही निर्भरता हमें गलत रिश्तों में टिके रहने पर मजबूर कर देती है, भले ही वो रिश्ता हमारे लिए हानिकारक हो।
गीता कहती है, हमें समुद्र की तरह होना चाहिए—पूर्ण, स्थिर और भीतर से संतुष्ट। सच्ची शांति तब मिलती है जब हम खुद को ‘पूरा’ समझते हैं, न कि किसी और से अपनी अधूरी भावना को भरवाना चाहते हैं।
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3. भावनात्मक उतार-चढ़ाव को प्रेम समझने की भूल

श्लोक – भगवद गीता 2.15
“यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥”
जब किसी रिश्ते में अत्यधिक भावना, जोश और दर्द होता है, तो हम उसे ‘सच्चा प्यार’ समझ बैठते हैं। लेकिन गीता कहती है कि सामत्व—सुख और दुख दोनों में स्थिर रहना—वास्तविक आत्मज्ञान की निशानी है।
हम जिन रिश्तों को “डेस्टिनी” समझते हैं, वो अक्सर हमारे अंदर की अस्थिरता और पुराने घावों का ही प्रतिबिंब होते हैं। सच में प्यार वहीं होता है जहाँ शांति होती है—जहाँ आत्मा को स्थायित्व मिले, न कि केवल भावनात्मक उथल-पुथल।
4. अहंकार बंधन बनाता है, आत्मा मुक्त करती है

श्लोक – भगवद गीता 2.47
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”
हम अक्सर रिश्तों में नियंत्रण चाहते हैं—वो क्या सोचते हैं? कब जवाब देंगे? हमें कितना प्यार करते हैं? यह सब हमारे अहंकार की मांगें हैं।
गीता सिखाती है कि हम केवल कर्म कर सकते हैं, फल पर हमारा कोई अधिकार नहीं। जब हम आत्मा से प्रेम करते हैं, तो अपेक्षा नहीं करते; हम बस देने की भावना से जुड़ते हैं। यही प्रेम बंधन नहीं, मुक्ति देता है।
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5. बार-बार एक जैसे दर्द का दोहराव – क्यों?

श्लोक – भगवद गीता 6.5
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥”
क्यों हम बार-बार ऐसे लोगों की तरफ खिंचते हैं जो हमें तोड़ते हैं? गीता कहती है कि हमारा मन ही हमारा सबसे बड़ा मित्र या दुश्मन बन सकता है।
यदि हमारा मन अनुशासित नहीं है, अगर हमारे बचपन के घाव या पिछले जन्मों के संस्कार अभी भी सक्रिय हैं, तो हम वही पैटर्न दोहराते रहते हैं। जब तक हम भीतर की जिम्मेदारी नहीं लेते, healing शुरू नहीं होती।
6. अल्पकालिक आकर्षण दीर्घकालिक पीड़ा का कारण बनता है

श्लोक – भगवद गीता 18.37
“यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥”
गीता हमें तीन प्रकार के सुखों के बारे में बताती है—सात्त्विक (शुद्ध), राजसिक (आकर्षणपूर्ण), और तामसिक (अंधकारमय)। अधिकतर रिश्ते राजसिक प्रकृति के होते हैं—तेज, आकर्षक, लेकिन अस्थिर।
शुरुआती उत्तेजना बाद में विष की तरह पीड़ादायक बन जाती है। इसके विपरीत, सात्त्विक प्रेम शुरुआत में शांत लगता है, लेकिन धीरे-धीरे आत्मा को शांति और स्थायित्व प्रदान करता है। सही प्रेम पहचानने के लिए आत्म-जागरूकता जरूरी है।
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प्रेम बंधन बन सकता है, लेकिन चेतना से वही प्रेम मुक्ति देता है
गीता सिखाती है कि सच्चा प्रेम वो नहीं जिसमें हम किसी और में खो जाएं, बल्कि वो जिसमें हम अपने आत्मा को खोजें।
हम जब बार-बार गलत लोगों की ओर आकर्षित होते हैं, तो असल में हम अपने भीतर की उन अधूरी परतों को ढूंढ रहे होते हैं जिन्हें अब तक हमने स्वीकार नहीं किया। हर गलत रिश्ता एक अवसर होता है—अपने भीतर झांकने का।
अगर हम इन पैटर्न्स को तोड़ना चाहते हैं, तो हमें भावनात्मक भूख से हटकर आंतरिक आत्मबोध की ओर जाना होगा। हमें प्रेम को पाना नहीं, प्रेम बनना होगा।
गीता का ज्ञान आज के रिश्तों में कैसे मदद करे
- मोहमाया से बचें, जो केवल आकर्षण है, न कि सच्चा प्रेम।
- स्वयं को पूर्ण माने, ताकि दूसरों से कम की अपेक्षा न रखें।
- भावनात्मक लहरों से ऊपर उठें और स्थिरता में प्रेम खोजें।
- अहंकार को पीछे छोड़ें, और निष्काम भाव से प्रेम करें।
- मन को अनुशासित करें, ताकि पुराने घावों की पुनरावृत्ति न हो।
- सात्त्विक प्रेम को पहचानें, जो दीर्घकाल में आत्मा को पोषण देता है।
“प्रेम में खोने की नहीं, स्वयं को पाने की यात्रा होनी चाहिए। गीता न केवल युद्धभूमि की कहानी है, यह हमारे भीतर के प्रेम युद्ध की भी मार्गदर्शिका है।”
यदि आप इन शिक्षाओं को अपनाएं, तो अगली बार आपका दिल किसी ऐसे के लिए नहीं धड़केगा जो आप